Monday, July 1, 2013

"संकुचित संस्कृति "

मूल्यों का वजन सिर्फ एक पे,
ये कैसा दर्शन ,विचार करना होगा...
लड़की समाज  में सुरक्षित है के नहीं के साथ ही,
बिगड़ते बेटों की स्थिति में सुधार करना होगा !!
आदमी हाफ पेंट में माचो और
महिला बदन बेच रही है,
ये कैसा न्याय है के एक की स्वतंत्रता
अगले को बंदी साबित कर  रही है ?
महिला  चेतना की हाय तौबा मचने वाले
आज गला फाड़ फाड़ चिल्लाते  हैं
के "उसके कपडे उसका शरीर"
ये "उनका" निजी फैसला "उनकी" स्वतंत्रता है ,
और अगले दिन ये ही झंडाबरदार
सिनेमा में कम कपडे पे हाय तौबा मचाते हैं !!
भारतीय संस्कृति अगर कोई संजोता है
तो ये अच्छी  बात है
पर अगर कोई बाहरी संस्कृति पिरोता है
तो क्या वो आदम जात नहीं ?
संस्कृति हर रूप में
समय के साथ बदलाव मांगती है
संस्कृति एक नदी है
रोक दिए जाने पर
गन्दा तालाब बन जाती है !!

:-विकास सिंह !!

------रास्ते-----


"रौंदते हैं हम ,उन्हें 

अपने क़दमों से ....
पर खोलते हैं वो दरवाजे ,
हमारे लिए !

बढ़ जाते हैं हम,अक्सर ,आगे 
रास्ते रह जाते हैं वहीँ ...
औरों को बढाने के लिए ..आगे !

कोई , वापस आता है,कोई नहीं 
कोई बदल जाता है , कोई नहीं 
पर नहीं बदलते , ये रास्ते !"

-
विकास !

आइना

"लाशें जल जायेंगी और मामले ठन्डे हो जायेंगे 
तबाही फिर आएगी , और आइना दिखाएगी !"

हम नहीं सुधरेंगे !
हम भगवान को फिर से गरियायेंगे !
यही सरकार दुबारा बनवायेंगे ..
कोशिश रहेगी तबाही इस बार बड़ी मंगवाएंगे !!
 

(उत्तराखंड त्रासदी पर )
-विकास !