"रौंदते हैं हम ,उन्हें
अपने क़दमों से ....
पर खोलते हैं वो दरवाजे ,
हमारे लिए !
बढ़ जाते हैं हम,अक्सर ,आगे
रास्ते रह जाते हैं वहीँ ...
औरों को बढाने के लिए ..आगे !
कोई , वापस आता है,कोई नहीं
कोई बदल जाता है , कोई नहीं
पर नहीं बदलते , ये रास्ते !"
-विकास !
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