Wednesday, January 30, 2013


ज़िन्दगी की राहें भी अजीब हैं
रूकती तभी हैं जब हम चलना नहीं चाहते !!
रुकना न तू ऐ मुसाफिर,
दो कदम दिल से बढ़ा
मंजिल तेरे पीछे पीछे आएगी !!

-
विकास सिंह !
हमारे गाँव में बहुत सालों से एक "धनुष्य यज्ञ" नाम का आयोजन होता है जिसमे सीता के स्वयंवर के समय हुए धनुष की प्रत्यंचा चढाने की कथा का मंचन होता है ..और तमाम राजा सीता के लिए अपना दावा बुलंद करने आते हैं और उसमे एक "गेस्ट अपीयरेन्स" के तौर एक राजा आते हैं जिन्हें "गदहवा राजा " कहा जाता है वो "गधे " पे बैठ के आते हैं !! जो ख़ास बात उनकी होती है वो ये के वो हर बात को कह के पलट जाते हैं और और सीधे सीधे गाली देके भोले बन जाते हैं ..अब आगे क्या कहूँ हर दिन एक न एक "गदहवा राजा " इस देश में पैदा हो जाता है ..कभी किसी "ओवैसी" के रूप में कभी "नंदी" तो कभी किसी "एस.आर.के " के रूप में !! कुल मिला के पब्लिक को ये बस ये सन्देश देना चाहते हैं की भाई हमको फॉलो करोगे तो तुम भी कहलाओगे "गधे "!!

Friday, January 25, 2013

कल २६ जनवरी है और इस दिन बहादुरी पुरस्कार भी दिए जाते हैं !
मेरे हिसाब से कुछ और पैमाने भी होने चाहिए जो देश में एक व्यक्ति की बहादुरी को दर्शाए -
तुषार का अभिनय ,जेनेलिया का संवाद और रेशमिया का उन्माद जो झेल ले वो बहादुर !!
राहुल के प्रयास ,दिग्गी की बकवास और पाकिस्तान की मिठास जो झेल ले वो बहादुर !!
पानी का मिसयूज़,सेक्युलर नेताओं के व्यूज़ और इण्डिया टीवी की न्यूज़ जो झेल ले वो बहादुर !!
पुलिस का सच ,रामगोपाल वर्मा का टच,इमाम-डाली बिंद्रा की मचमच जो झेल ले वो बहादुर !!
भारत की रेल,नौकरी की ठेलमठेल और संधिसुधा का तेल जो झेल ले वो बहादुर !!
और समाज में व्याप्त भ्रष्टाचार,महिलाओं पर अत्याचार और कांग्रेस की सरकार जो झेल ले वो ....
वो बहादुर नहीं वो कायर .....वो कायर !!

Sunday, January 20, 2013

रात भर ठण्ड में कांपती रही वो बुढ़िया 
कल अपने बेटे को आंचल ओढाया था जिसने 
मैं साक्षी था उस दृश्य का 
एक माँ के दर्द का एहसास कराया था जिसने 
माँ की बातें माँ का प्यार 
माँ की ममता माँ का दुलार 
वो माँ ही थी, उसका जूठा, खाया था जिसने 
वो माँ ही थी उसे चलना सिखाया था जिसने 
उस माँ को उसने भुला दिया 
उसके निश्छल प्यार का ये सिला दिया 
के छाले भी पाँव के उसके नहीं सूखते ...!!
और उस बेटे के प्यार की इन्तहा देखिये 
उसकी माँ नहीं रोती...लोग उसे देख के रोते हैं !

-विकास सिंह 
*****पान खाइए और देश चमकाइये (पढ़ें ज़रूर )*****
मनुष्य ने जब से इस धरती पे जन्म लिया है वो सदा कुछ ऐसा करता आया है जो उसे जीवन में आगे ले गया !! इसी क्रम में उसके द्वारा इजाद की गयी एक उत्तम विधा है –पान चबाना !!
कहते हैं की हम दुनिया भर की तमाम हरी सब्जियां खा ले तब भी इतना पोषण नहीं मिलता जितना पान चबाने से और अगर पान में गुटखा भी मिला हुआ हो तो बात ही निराली है !! सिर्फ पान चबाना नहीं वरन उसे चबा के पिच्च से थूक देने का अलग ही मजा है ,वहीँ इसका पौराणिक महात्म्य भी है!
कहते हैं की प्राचीन काल में जब दुर्योधन युद्ध पे जाता था तो पहले पान खाता था और फिर थूक के ख़ुशी ख़ुशी निकलता था..कहते हैं तभी से ये प्रथा चली आ रही है !
पान खा के थूकने से न सिर्फ आप हल्का महसूस करते हैं बल्कि जिस पथ पे आप चलते हैं वो भी रंगीन होती जाती है और अगर ये चित्रकारी नयी पुती पुताई दीवार पे की जाय तो क्या बात है जैसे “सोने पे सुहागा “..और उस दीवार की सूप्नखा सी खूबसूरती देखते ही बनती है !! पान के गुण यही तक सीमित नहीं हैं पर इसकी और भी कई विशेषताएँ हैं मसलन –जब मुह में पान भरा रहता है तो किसी से बोलने की ज़हमत आपको उठानी नहीं पड़ती (आपकी ऊर्जा भी बचती है ) और साइन लैंग्वेज में बात करने की आपकी प्रैक्टिस भी बन जाती है जो गूंगे बहरे लोगों से और अगर आप खुद भी हो गए तो बात करने में बहुत काम आती है ..ये तो वाही बात हुयी के “आम के आम गुठलियों के दाम “ !
रामचरितमानस में तुलसीदास जी लिखते हैं “लंका में जब राक्षस पान खा के निकलते थे तो उनकी आभा देखने लायक होती थी और हर दीवार मानो चीख चीख के कहती थी मुझपे थूको मुझपे थूको “ !
सिन्धु घाटी सभ्यता में भी कई जगह लाल मिटटी का पाया जाना इस बात को दर्शाता है की वहां भी लोग पान खाया करते थे समूहों में थूका करते थे ! प्रख्यात इतिहासकार “नाथू लाल जी पनवाड़ी “ ने अपनी पुस्तक “इतिहास की बकवास “ में इस विषय का वर्णन करते हुए लिखा है की “ लोग न सिर्फ पान के खाने के प्रेमी थे बल्कि पान खा के थूकने की प्रतियोगिता भी आयोजित की जाती थी वहां” !
अंग्रेजों के ज़माने में क्रांतिकारियों के लिए मिठाइयाँ बना कर देशभक्ति के लिए अपनी जवानी लगाने वाले “श्री छगन लाल हलवाई “ कहते हैं के “आज भी जब मै आज कल के युवाओं का पान का सदुपयोग करते हुए देखता हूँ दिल खुसरोबाग हो जाता है ! एक समय तो लगा की सदियों से चली आ रही ये प्रथा विलुप्त हो जायगी पर युवाओं में देश को गन्दा करने का जोश देखकर अच्छा लगता है “
बात को आगे बढ़ाते हुए वो कहते हैं के किसी सार्वजनिक स्थान पर जब जाता हूँ और दीवारों का साफ़ सुथरा पता हूँ तो मन में बहुत ग्लानी होती है ,अफ़सोस भी होता है के युवाओं को ये दीवारें क्यूं नहीं दिखती ? खैर जितना हो सकता है सबको थूकने के लिए जगाता रहता हूँ और दीवारें दिखाता रहता हूँ की यहाँ थूको वहां थूको ..नहीं तो खुद ही पान रखा रहता हूँ और खुद थूक देता हूँ “ !!
समाज में पान के महत्ता उसके महात्म्य और होने वाले सदुपयोग को देखते हुए दो पंक्तियाँ सहज ही दिमाग में आती हैं --
“रहिमन पान चबाइए ,इकरे बिन सब सून “
थूक पड़े तो खिल उठे , हर दीवार का चून” !!