Sunday, January 20, 2013

*****पान खाइए और देश चमकाइये (पढ़ें ज़रूर )*****
मनुष्य ने जब से इस धरती पे जन्म लिया है वो सदा कुछ ऐसा करता आया है जो उसे जीवन में आगे ले गया !! इसी क्रम में उसके द्वारा इजाद की गयी एक उत्तम विधा है –पान चबाना !!
कहते हैं की हम दुनिया भर की तमाम हरी सब्जियां खा ले तब भी इतना पोषण नहीं मिलता जितना पान चबाने से और अगर पान में गुटखा भी मिला हुआ हो तो बात ही निराली है !! सिर्फ पान चबाना नहीं वरन उसे चबा के पिच्च से थूक देने का अलग ही मजा है ,वहीँ इसका पौराणिक महात्म्य भी है!
कहते हैं की प्राचीन काल में जब दुर्योधन युद्ध पे जाता था तो पहले पान खाता था और फिर थूक के ख़ुशी ख़ुशी निकलता था..कहते हैं तभी से ये प्रथा चली आ रही है !
पान खा के थूकने से न सिर्फ आप हल्का महसूस करते हैं बल्कि जिस पथ पे आप चलते हैं वो भी रंगीन होती जाती है और अगर ये चित्रकारी नयी पुती पुताई दीवार पे की जाय तो क्या बात है जैसे “सोने पे सुहागा “..और उस दीवार की सूप्नखा सी खूबसूरती देखते ही बनती है !! पान के गुण यही तक सीमित नहीं हैं पर इसकी और भी कई विशेषताएँ हैं मसलन –जब मुह में पान भरा रहता है तो किसी से बोलने की ज़हमत आपको उठानी नहीं पड़ती (आपकी ऊर्जा भी बचती है ) और साइन लैंग्वेज में बात करने की आपकी प्रैक्टिस भी बन जाती है जो गूंगे बहरे लोगों से और अगर आप खुद भी हो गए तो बात करने में बहुत काम आती है ..ये तो वाही बात हुयी के “आम के आम गुठलियों के दाम “ !
रामचरितमानस में तुलसीदास जी लिखते हैं “लंका में जब राक्षस पान खा के निकलते थे तो उनकी आभा देखने लायक होती थी और हर दीवार मानो चीख चीख के कहती थी मुझपे थूको मुझपे थूको “ !
सिन्धु घाटी सभ्यता में भी कई जगह लाल मिटटी का पाया जाना इस बात को दर्शाता है की वहां भी लोग पान खाया करते थे समूहों में थूका करते थे ! प्रख्यात इतिहासकार “नाथू लाल जी पनवाड़ी “ ने अपनी पुस्तक “इतिहास की बकवास “ में इस विषय का वर्णन करते हुए लिखा है की “ लोग न सिर्फ पान के खाने के प्रेमी थे बल्कि पान खा के थूकने की प्रतियोगिता भी आयोजित की जाती थी वहां” !
अंग्रेजों के ज़माने में क्रांतिकारियों के लिए मिठाइयाँ बना कर देशभक्ति के लिए अपनी जवानी लगाने वाले “श्री छगन लाल हलवाई “ कहते हैं के “आज भी जब मै आज कल के युवाओं का पान का सदुपयोग करते हुए देखता हूँ दिल खुसरोबाग हो जाता है ! एक समय तो लगा की सदियों से चली आ रही ये प्रथा विलुप्त हो जायगी पर युवाओं में देश को गन्दा करने का जोश देखकर अच्छा लगता है “
बात को आगे बढ़ाते हुए वो कहते हैं के किसी सार्वजनिक स्थान पर जब जाता हूँ और दीवारों का साफ़ सुथरा पता हूँ तो मन में बहुत ग्लानी होती है ,अफ़सोस भी होता है के युवाओं को ये दीवारें क्यूं नहीं दिखती ? खैर जितना हो सकता है सबको थूकने के लिए जगाता रहता हूँ और दीवारें दिखाता रहता हूँ की यहाँ थूको वहां थूको ..नहीं तो खुद ही पान रखा रहता हूँ और खुद थूक देता हूँ “ !!
समाज में पान के महत्ता उसके महात्म्य और होने वाले सदुपयोग को देखते हुए दो पंक्तियाँ सहज ही दिमाग में आती हैं --
“रहिमन पान चबाइए ,इकरे बिन सब सून “
थूक पड़े तो खिल उठे , हर दीवार का चून” !!

No comments:

Post a Comment